मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

राजनीतिक सुरक्षा 

संसद में चल रही बहसों में एक अजीब सी बेचैनी और सहूलियत दिखाई दे रही है। यह देखना अद्भुत है कि किस तरह सभी वक्ता गण स्वयं का बचाव और दूसरे पर आक्रमण करने में अम्बेडकर का सहारा ले रहे हैं लेकिन यह करते हुए अम्बेडकर के विचारों की प्रासंगिकता को दूषित कर रहे हैं। अपनी श्रेष्ठता को साबित करने के लिए अम्बेडकर की आड़ में दूसरे लोगों के योगदान और निष्ठां को प्रश्नांकित कर रहे हैं. यह दुर्भाग्य है इस देश का कि गोडसे को स्थापित करने के लिए गांधी नेहरू को कलंकित करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है।  आनेवाली पीढ़ी को हम क्या बताने के लिए उत्सुक हो रहे हैं कि इस देश के लिए सर्वोच्च बलिदान गोडसे ने किया ?  अम्बेडकर के बहाने खुद को सही साबित करते हुए क्या हम यह विस्मृत नही कर रहे हैं कि उसी अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म को असहिष्णु बताते स्वयं धर्म परिवर्तन कर लिया था।  राष्ट्र का धर्म निरपेक्ष स्वरुप नहीं होना चाहिए ? इस पर विचार आवश्यक है तथा संदर्भो के सही विमर्श की आवश्यकता है। 

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शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

जादू की छड़ी

मंहगाई की कहानी या गरीबी की कहानी में पात्र तो एक ही है गरीब. गरीबी और मंहगाई दोनों केवल गरीब को ही मारती हैं. तो क्या करें गरीब को ही मार दें . समस्या समाप्त।  न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। ह्वाट्स अन आईडिया सर जी। लेकिन गरीब वोट देने के काम आता है बार बार छाला जाता है फिर वादों पर विश्वास करता है और फिर रोता है अपना सिर धुनता है। भगवान को कोसता है। अपने भाग्य को दोष देता है। और अंत में आत्महत्या कर लेता है और कानून की भाषा में अपराधी हो जाता है। कमॉल है कि जिसका खून हुआ कातिल भी वही है। ये है जादू. जिस जादू की छड़ी हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी 10 वर्षों से ढूंढ़ रहे है मगर यह जादू की छड़ी है कि  गरीब का क़त्ल करके उसे ही कातिल बना देती है मगर प्रधानमंत्री जी के हाँथ नही आती है। अब पता चल रहा है कि हमारे महामहिम प्रणव मुखर्जी जब तक वित्त मंत्री थे तब तक उनको गरीब या गरीबी से कोई मतलब नहीं था अब गरीबों और गरीबी की बात करते हैं। आप जानते हैं क्यों ? क्योंकि इसी गरीब के वोट ने उन्हें इस देश का प्रथम नागरिक बना दिया। अब पता चल रहा है की आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद जिन कैदियों को सजा अब तक नहीं मिल पाई थी उन्हें अब सजा जरुर मिल जाएगी क्योंकि महामहिम ने आतंकवाद के खिलाफ लडाई को चौथा विश्वयुद्ध की संज्ञा दी है। मतलब यह कि  गरीब के पास वो जादू की छड़ी है जिससे ज्ञान विज्ञानं दोनों के दरवाजे खुल जाते हैं. इसलिए गरीब को मारना बेवकूफी है। उसे खुद घुट घुट के मरने के लिए छोड़ देते हैं। और नारायण दत्त तिवारी जी के निजी मामले में चुप रहते है क्योंकि उन्होंने अब जाकर बताया है की रोहित शर्मा का मामला मेरा निजी मामला है। रोहित से एक बात समझ में आई कि -
              कौन कहता है कि  आसमान में सुराख़ नही हो सकता .
              एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

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सोमवार, 8 नवंबर 2010

चुनाव और राहुल गाँधी

राहुल गाँधी को भारत का युवा वर्ग बड़े ही सम्भाव्नावो के साथ निहार रहा है परन्तु बिहार में हो रहे इस चुनाव ने राहुल गाँधी की बौद्धिकता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। राहुल गाँधी का आर एस एस के बारे में की गयी टिप्पड़ी पर गौर करे तो सहज ही एक अविश्वास पैदा होता है कि क्या यह वही राहुल गाँधी है जिसे भारत के प्रधानमंत्री के रूप में देखा और प्रस्तुत किया जा रहा है या यह लड़का कोई नया नया सा लगता है। भारत के गरीबो कि झोपडी में जा करके उनके साथ बैठना बात करना उनके साथ रोटी के दो निवाले भी खा लेने वाले राहुल से आम जनता एक आशा कि निगाहों से देख रही है कि आम जन कि पीड़ा को पहचानने वाला भी इस धरा पर है विशेषत नेता वर्ग में। लेकिन आर एस एस कि राष्ट्र भक्ति के बारे में टिप्पड़ी करके जिस तरह कि बौद्धिकता का परिचय राहुल गाँधी ने दिया है वह सहज ही जन सामान्य कि भावना को तोड़ने वाला लगता है। अगर देश के तमाम संगठनो के बारे में ऐसी ही राय उनके दिमाग में है तो आने वाला भविष्य कोई सुखद दिखाई नहीं दे रहा है। क्या यह सिर्फ पोलिटिकल स्टंट है या उनकी अज्ञानता। ईश्वर करे कि यह सिर्फ पोलिटिकल स्टंट हो हलाकि उनके जैसे कद के नेता से ये उम्मीद नहीं कि जाती कि सिर्फ चुनावी रणनीति के कारण ऐसा बयां दे । राहुल जी अपनी पार्टी को बिहार कि सत्ता कि चाभी सौपने में आप अपनी विश्वास कि चाभी न खो दे। जनता का विश्वास एक ऐसी पूंजी होती है कि एक बार खो देने के बाद कभी वापस नहीं मिलती। यह बड़ा घटे का सौदा होगा।
विनय कुमार सिंह , लोकनाथ महाविद्यालय रामगढ चंदौली

शनिवार, 27 मार्च 2010

Fwd: pariksha ki nautanki.



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Date: 2010/3/13
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परीक्षा की नौटंकी
माध्यमिक शिक्षा परिषद् कि परीक्षाएं प्रारम्भ हो गयी हैं . विगत वर्ष कि भांति इस वर्ष भी बड़े बड़े दावे किये गए परन्तु परिणाम वही ढांक के तीन पात. समझ में नहीं आता कि हर बार माननीय मंत्री जी पूरे साल नियम उपनियम बनाने कि बात करते हैं. दागी विद्यालयों को परीक्षा केंद्र नहीं बनाया जायेगा कि बात करने वाला प्रशासन अंत में क्यूँ सो जाता है. यही नहीं बल्कि उससे भी दो कदम आगे जाते हुए उन विद्यालयों को अधिकतम छात्रों का परीक्षा केंद्र बना दिया जाता है जिनके पास मूलभूत सुबिधायों का अभाव ही नहीं बल्कि अनुभवी अध्यापकों का भी टोटा है. उसके बाद शुरू होता है विद्यालयों और उसके प्रधानाचार्यों पर कार्यवाही का नाटक. इस पूरी कवायद में छात्र  और छात्र हित की बात नहीं सोची जाती है. प्रशन ये उठता है कि आखिर सरकार चाहती क्या है और दिखाना क्या चाहती है. जिस तरह से परीक्षाएं चल रही हैं उनकी सुचिता एवं पवित्रता के बारे में सोचना परेशान करने वाला है. मंत्री जी की कार्यशैली पर उंगली उठाने कि हिम्मत किसी की नहीं हो रही है. परन्तु यह भी सोचना शेष है कि क्या इसके लिए सिर्फ सरकार ही दोषी है या इसमें हमारी भी हिस्सेदारी है. सिस्टम का अंग तो हम सभी हैं फिर सिर्फ सरकार या उसकी कार्य प्रणाली को दोष देकर हम कर्त्तव्य मुक्त हो जायेगें. यह अभी से सोचना प्रारम्भ करें कि ऐसी शिक्षा देकर हम देश एवं देश कि भावी पीढ़ी को कौन सी दिशा दे रहे हैं. गणतंत्र में सभी अपनी अपनी भूमिका को पहचानने का कष्ट करें. जय हिंद.
                  विनय कुमार सिंह , लोकनाथ महाविद्यालय रामगढ चंदौली.  

Fwd: For your news paper.



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Date: 2010/3/28
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महज संयोग या कुछ और !
मैं यह जानते हुए भी कि मेरी यह बात आपके समाचारपत्र में नहीं प्रकाशित होगी फिर भी यह कहना चाहता हूँ कि प्रदेश से लेकर केंद्र तक की सत्ता में शिक्षा के मंत्री पदों पर आसीन मंत्रियों में समानता महज संयोग है या कुछ  और है. जिस तरह के तुगलकी फैसले प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा मंत्रियों द्वारा लिए जा रहे हैं और उसपे भी तीन कदम आगे निकलते हुए केंद्रीय मंत्री के तुगलकी सुधारवादी फरमान आदि पर गौर करें तो एक बात अत्यंत स्पष्ट रूप से सामने आती है कि किस तरह शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभाग को खाद्य मंत्री जैसे शेकचिल्लियों के हवाले कर दिया गया है. आज के इन मंत्रियों के बयानों एवं कार्यों पर एक नजर डालें तो स्पष्ट हो जाता है कि सुधारों की बात कर रहे इन लोगों के दिमाग में शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर कोई स्पष्ट योजना नहीं है सिवाय जनता में फैले इस विश्वास को छोड़कर कि यह नौटंकी महज अपना आर्थिक हिस्सा पाने से है. हो रही परीक्षायों में नक़ल रोकने में पूरी तरह अक्षम साबित हो चुका प्रशासन सिर्फ परीक्षा केन्द्रों को निरस्त करने एवं दोबारा परीक्षा करने कि बात कर रहा है और इसके लिए बाकायदा टाइम टेबल भी घोषित किया जा चुका है. प्रश्न ये उठता है कि क्या दोबारा होने वाली परीक्षा नक़ल विहीन होगी इसकी गारंटी ली जा सकती है वर्त्तमान शिक्षा - परीक्षा व्यवस्था को देखते हुए. क्या पिछले वर्ष दोबारा सम्पन्न करायी गयी परीक्षा नक़ल विहीन थी? या इन निर्णयों के पीछे  अर्थतंत्र का खेल खेला जाने वाला है? केंद्रीय मंत्री साहब भी दूरस्थ शिक्षा केन्द्रों से शोध कर रहे छात्रो की शोध डिग्रियों की वैधता के बारे में कुछ कहना चाहेगें या फरमान सुनाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री करली है और इन केन्द्रों को शोध डिग्रियों के नाम पर धन वसूलने पर अपनी अघोषित रजामंदी दे दी है. इस देश में विदेशी शिक्षण संस्थाओं के आ जाने मात्र से शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने का दिवास्वप्न देखना छोड़ें और अपने घर के चिरागों को रौशन कर उजाला फैलाएं.
विनय कुमार सिंह , लोकनाथ महाविद्यालय रामगढ चंदौली.


सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

नेता कि वासना

बिहार के नेता ने यदि बार गर्ल के साथ नृत्य क्या कर दिया मिडिया वालों को खजाना मिल गयालगे उसकी फोटो दीखानेमै कहता हू कि जब अपने कृष्ण भगवान वृन्दावन में रास रचाते थे तो आपको कोई परेशानी नहीं थी । थोड़ा सा अपने नेता भगवान ने नृत्य क्या कर दिया लगे हल्ला मचाने।अरे भैया आजकल के नेताजी किसी कृष्ण भगवान से कम हैं। ये तो सोचो कि इससे बार गर्ल की भी तो इच्छा पूरी हुयी होगी। अपना सपना मनी- मनी की तर्ज पर कार्य कर रही इन बार बालाओं की मजबूरी समझते हुए नेताजी ने उन्हें कुछ फायदा पहुचाने की कोशिश की तो आप बुरा मान गए ।वैसे नेता भी आदमी ही होता है और मनोवैज्ञानिको की मानें तो सेक्स प्राथमिक आवश्यकता है। इस दिशा में सोचें और बी रिलैक्स यारों। चलते - चलते एक शरारत -
उनकी हर शाम गुजराती है दिवाली की तरह। हमने इक दीप जलाया तो बुरा मान गए।